any females are intrested n sex so call me
इस कहानी का लेखक मैं नहीं हूं. मैंने इसमें केवल कुछ संशोधन किये हैं. तो प्रस्तुत है धीरज की आँख खुलीं, तो सामने टँगे हुए कैलेंडर ने एक परंपरागत पड़ोसी की तरह मौका मिलते ही सच्चाई का ज्ञान करा देने के अंदाज़ में उसे आज की तारीख़ बता दी और बड़ी ही बेरहमी से उन २५ साल, १० महीने, १२ दिनों का एहसास भी करा दिया जो धीरज ने इस धीरज के साथ बिताए थे कि धीरज का फल मीठा होता है। ठीक एक महीना पहले पूरे हुए एम.बी.ए. के एक महीने बाद आज २६ अप्रैल, २००९ को भी उसका जीवन उतना ही खाली था जितना एम.बी.ए. में प्रवेश लेते समय या उससे पहले के किसी भी पल।
बढ़िया सेंस आफ ह्यूमर, ठीक-ठाक शक्ल, औसत कद, अति-औसत वज़न, गेहुँआ रंग, काम चलाऊ बुद्धि और अनावश्यक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली एक बड़ी-सी नाक वाले धीरज ने लड़कियों को उनकी उस पसंद के लिए अक्सर कोसा था जिसके अंतर्गत वह लड़कियों को कभी पसंद नहीं आया था। यों पसंद वह लड़कों को भी कुछ ख़ास न था पर इसका उसे कुछ अफ़सोस न था।
सच्चाई से मुँह फेरने की ख़ातिर धीरज ने करवट बदली तो बगल की दीवार पर टँगी घड़ी ने उसे उस दिन के दूसरे सच से अवगत करा दिया। ७.३० बज चुके थे और ८.०० बजे की बस पकड़ने के लिए उसके पास सिर्फ़ आधा घंटा था जो यों तो नाकाफी था पर सुबह के कुछ ज़रूरी कामों से जान चुराने का अच्छा बहाना बन सकता था जिनमें धीरज की कुछ ख़ास रुचि नहीं थी।
मन मारकर उसने बिस्तर छोड़ा, टेढ़ी-मेढ़ी अंगड़ाइयाँ लीं और जैसे-तैसे अपने को बाहर जाने लायक स्थिति में लाने के लिए बाथरूम की ओर चल दिया। बाहर आया तो भाभी पहले ही चाय तैयार कर चुकीं थीं। धीरज ने एक पल घड़ी को देखा, दिमाग में कुछ हिसाब लगाया और चाय पीने बैठ गया। मरीन इंजिनीयरिंग की तथाकथित पैरा-मिलैट्री स्टाइल ट्रेनिंग ने उसे और कुछ भले ही न सिखाया हो पर फटाफट तैयार होना ज़रूर सिखा दिया था। ऐसे भी, मरीन इंजिनीयरिंग में, इससे ज़्यादा सीखने की ज़रूरत भी नहीं होती। धीरज ने उन चारों सालों की पढ़ाई को मन ही मन धन्यवाद दिया जिसके कारण वह आज लेट होने के बाद भी इत्मिनान से बस पकड़ सकता था।
इसी अत्यधिक आत्मविश्वास के चलते उसने आराम से चाय पी, फैलकर 'डेली टाइम्स' की रंगीनियत में झाँका और भैया के कार से बस स्टैण्ड पर ड्रॉप कर देने के प्रस्ताव को भी सर हिला कर ना कर दिया। इसका उसे बाद में अफ़सोस भी हुआ क्योंकि भैया ने उसके इंकार को गंभीरता से ले लिया और दुबारा पूछा ही नहीं। धीरज महाराज भी तैश में आ गए और मन पक्का कर पैदल ही बस स्टैण्ड की तरफ़ चल पड़े।
बस स्टैण्ड ज़्यादा दूर तो नहीं था पर पैदल पहुँचने में कुछ समय तो लगता है। धीरज ने फिर से हिसाब लगाया तो मामला अब समया-सीमा पर पहुँचा था। कदमों में अपने आप ही कुछ तेज़ी-सी आ गई। दूर से ही उसने बस स्टॉप पर खड़ी बस को स्पॉट कर लिया और बस पकड़ने के लिये पूरी ताकत से दौड़ लगा दी। भाग कर बस पकड़ने में धीरज उस्ताद था ही। हालाँकि इस बार बस को भाग कर पकड़ने का कुछ खास फायदा उसे नहीं हुआ क्योंकि ट्रैफिक जाम में फँसे होने के कारण बस काफी देर वहीं खड़ी रही।
फूले हुए साँस के साथ धीरज अंदर घुसा और घुसते ही पैनी निगाहों से अंदर का तेज़ी से मुआयना किया। सबसे पीछे, खिड़की की सीट पर बैठी लड़की के बराबर में एक सीट खाली थी। लड़की कुछ ख़ास नहीं थी पर लड़की थी जो धीरज के लिए काफी था। यों सीटें और भी एक-दो खाली थीं पर धीरज ने, स्वाभाविक रूप से, वहीं बैठने का फ़ैसला किया और मौका कहीं मिस ना हो जाए इस डर से तुरंत सीट की ओर लपक लिया।
बढ़िया सेंस आफ ह्यूमर, ठीक-ठाक शक्ल, औसत कद, अति-औसत वज़न, गेहुँआ रंग, काम चलाऊ बुद्धि और अनावश्यक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली एक बड़ी-सी नाक वाले धीरज ने लड़कियों को उनकी उस पसंद के लिए अक्सर कोसा था जिसके अंतर्गत वह लड़कियों को कभी पसंद नहीं आया था। यों पसंद वह लड़कों को भी कुछ ख़ास न था पर इसका उसे कुछ अफ़सोस न था।
सच्चाई से मुँह फेरने की ख़ातिर धीरज ने करवट बदली तो बगल की दीवार पर टँगी घड़ी ने उसे उस दिन के दूसरे सच से अवगत करा दिया। ७.३० बज चुके थे और ८.०० बजे की बस पकड़ने के लिए उसके पास सिर्फ़ आधा घंटा था जो यों तो नाकाफी था पर सुबह के कुछ ज़रूरी कामों से जान चुराने का अच्छा बहाना बन सकता था जिनमें धीरज की कुछ ख़ास रुचि नहीं थी।
मन मारकर उसने बिस्तर छोड़ा, टेढ़ी-मेढ़ी अंगड़ाइयाँ लीं और जैसे-तैसे अपने को बाहर जाने लायक स्थिति में लाने के लिए बाथरूम की ओर चल दिया। बाहर आया तो भाभी पहले ही चाय तैयार कर चुकीं थीं। धीरज ने एक पल घड़ी को देखा, दिमाग में कुछ हिसाब लगाया और चाय पीने बैठ गया। मरीन इंजिनीयरिंग की तथाकथित पैरा-मिलैट्री स्टाइल ट्रेनिंग ने उसे और कुछ भले ही न सिखाया हो पर फटाफट तैयार होना ज़रूर सिखा दिया था। ऐसे भी, मरीन इंजिनीयरिंग में, इससे ज़्यादा सीखने की ज़रूरत भी नहीं होती। धीरज ने उन चारों सालों की पढ़ाई को मन ही मन धन्यवाद दिया जिसके कारण वह आज लेट होने के बाद भी इत्मिनान से बस पकड़ सकता था।
इसी अत्यधिक आत्मविश्वास के चलते उसने आराम से चाय पी, फैलकर 'डेली टाइम्स' की रंगीनियत में झाँका और भैया के कार से बस स्टैण्ड पर ड्रॉप कर देने के प्रस्ताव को भी सर हिला कर ना कर दिया। इसका उसे बाद में अफ़सोस भी हुआ क्योंकि भैया ने उसके इंकार को गंभीरता से ले लिया और दुबारा पूछा ही नहीं। धीरज महाराज भी तैश में आ गए और मन पक्का कर पैदल ही बस स्टैण्ड की तरफ़ चल पड़े।
बस स्टैण्ड ज़्यादा दूर तो नहीं था पर पैदल पहुँचने में कुछ समय तो लगता है। धीरज ने फिर से हिसाब लगाया तो मामला अब समया-सीमा पर पहुँचा था। कदमों में अपने आप ही कुछ तेज़ी-सी आ गई। दूर से ही उसने बस स्टॉप पर खड़ी बस को स्पॉट कर लिया और बस पकड़ने के लिये पूरी ताकत से दौड़ लगा दी। भाग कर बस पकड़ने में धीरज उस्ताद था ही। हालाँकि इस बार बस को भाग कर पकड़ने का कुछ खास फायदा उसे नहीं हुआ क्योंकि ट्रैफिक जाम में फँसे होने के कारण बस काफी देर वहीं खड़ी रही।
फूले हुए साँस के साथ धीरज अंदर घुसा और घुसते ही पैनी निगाहों से अंदर का तेज़ी से मुआयना किया। सबसे पीछे, खिड़की की सीट पर बैठी लड़की के बराबर में एक सीट खाली थी। लड़की कुछ ख़ास नहीं थी पर लड़की थी जो धीरज के लिए काफी था। यों सीटें और भी एक-दो खाली थीं पर धीरज ने, स्वाभाविक रूप से, वहीं बैठने का फ़ैसला किया और मौका कहीं मिस ना हो जाए इस डर से तुरंत सीट की ओर लपक लिया।
इस लपक-झपक के दौरान हुए हल्के-फुल्के स्पर्श का लड़की ने अपनी नाक मुँह सिकोड़ कर भारी-भरकम जवाब दिया। उत्तर-स्वरूप धीरज ने अपने मासूम चेहरे पर क्षमा याचना भरी मुस्कान बिखेर दी। लड़की ने मायावती की तरह धीरज को देखा और फिर ऐश्वर्या की तरह अपना मुँह दुसरी तरफ़ मोड़ लिया। और इस तरह एक बार फिर, लड़की को देखकर जागा धीरज का प्रारंभिक उत्साह हर बार की तरह ठंडा हो चला था।
'टिकट! हाँ जी। टिकट बोलिये, साहब।'' कंडक्टर उसी की तरफ़ इशारा कर के पूछ रहा था। अपने उठने से होने वाले किसी भी संभावित कष्ट से लड़की को बचाते हुए धीरज सावधानीपूर्वक उठकर कंडक्टर के पास पहुँचा और ५० का नोट बढ़ाकर बोला, ''एक बाबूगढ़ का टिकट देना।''
हुम्म...रंग तो साफ़ है। धीरज लड़की की ओर देखकर सोच रहा था। जाटनी लगती है। दुपट्टे से सर ढक रखा है। गाँव की होगी। पहली बार अकेले बाहर आई है। इतनी ख़ास तो है नहीं फिर इतना क्यों इतरा रही है? शक्ल नहीं है आठ आने की और खुद को मिस इंडिया समझती है।
अपनी एम.बी.ए. की डिग्री के बड़प्पन और लड़की के संभावित गँवारपन के तुलनास्वरूप धीरज के होंठो पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान खेल गई और उसे यह भी ध्यान न रहा कि कंडक्टर कब से उसे ही पुकार रहा था।
''साहब…..!'' कंडक्टर ने ज़ोर से पकड़ कर धीरज को हिलाया।
''हाँ...हाँ।'' धीरज ने चौंककर कंडक्टर की तरफ़ देखा।
''लड़की घूरने से फ़ुर्सत मिल गई हो तो बाबूगढ़ का टिकट और ये बचे हुए २२ रुपये भी ले लो।''
कंडक्टर की बात सुन पूरी बस मे ठहाका गूँज गया। खिड़की वाली लड़की ने बिना नज़र हटाये ही एक तीखी मुसकान दी जिसे देख धीरज झेंप गया और टिकट व पैसे ले चुपचाप अपनी सीट पर आकर बैठ गया। कंडक्टर के सरेआम मज़ाक से धीरज थोड़ा असहज महसूस कर रहा था।
इस दो कौड़ी के कंडक्टर ने पूरी बस के सामने मेरी इज़्ज़त दो कौड़ी कर दी। ये लड़की भी मेरे बारे में जाने क्या सोच रही होगी। गुस्से में लग रही है। गुस्सा होती है तो हो, मेरी बला से। लड़की को बस घूर ही तो रहा था, काई ऐसी-वैसी हरकत तो नहीं की?
लड़की अभी भी खिड़की के बाहर ही देख रही थी। धीरज ने खुद को सँभाला, थोड़ी देर इधर-उधर देखने का नाटक किया और फिर अपना ध्यान खिड़की के शीशे में दिख रहे लड़की के प्रतिबिंब पर टिका दिया।
छठी-सातवीं तक पढ़ी होगी। बहुत समझो तो हाईस्कूल। सेकंड डिवीज़न, आर्ट साइड। लड़की सीधी है पर पटाई जाए तो पट सकती है। बेटा धीरज ट्राई तो कर एक बार। मगर कैसे। मेरे फर्स्ट इंप्रैशन की तो इस कंडक्टर के बच्चे ने पहले ही वाट लगा दी। कोई नहीं। हिम्मते मर्दा मददे खुदा। अबे तू एम.बी.ए. है। बातों-बातों में बता दे फिर तो पटेगी ही। पर बात कैसे शुरू करू।
हाँ...फोन माँगता हूँ इससे। कह देता हूँ मेरे मोबाइल की बैट्री डिस्चार्ज हो गई है, एक अर्जेंट फोन करना है। लेकिन मना कर दिया तो? तब की तब देखी जाएगी। एक बार माँग तो सही।
''इक्सक्यूज़ मी मिस, कैन आई यूज़ योर फोन प्लीज़?''
'धीरे बोल धीरज धीरे।'
कहानी जारी है.......
'टिकट! हाँ जी। टिकट बोलिये, साहब।'' कंडक्टर उसी की तरफ़ इशारा कर के पूछ रहा था। अपने उठने से होने वाले किसी भी संभावित कष्ट से लड़की को बचाते हुए धीरज सावधानीपूर्वक उठकर कंडक्टर के पास पहुँचा और ५० का नोट बढ़ाकर बोला, ''एक बाबूगढ़ का टिकट देना।''
हुम्म...रंग तो साफ़ है। धीरज लड़की की ओर देखकर सोच रहा था। जाटनी लगती है। दुपट्टे से सर ढक रखा है। गाँव की होगी। पहली बार अकेले बाहर आई है। इतनी ख़ास तो है नहीं फिर इतना क्यों इतरा रही है? शक्ल नहीं है आठ आने की और खुद को मिस इंडिया समझती है।
अपनी एम.बी.ए. की डिग्री के बड़प्पन और लड़की के संभावित गँवारपन के तुलनास्वरूप धीरज के होंठो पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान खेल गई और उसे यह भी ध्यान न रहा कि कंडक्टर कब से उसे ही पुकार रहा था।
''साहब…..!'' कंडक्टर ने ज़ोर से पकड़ कर धीरज को हिलाया।
''हाँ...हाँ।'' धीरज ने चौंककर कंडक्टर की तरफ़ देखा।
''लड़की घूरने से फ़ुर्सत मिल गई हो तो बाबूगढ़ का टिकट और ये बचे हुए २२ रुपये भी ले लो।''
कंडक्टर की बात सुन पूरी बस मे ठहाका गूँज गया। खिड़की वाली लड़की ने बिना नज़र हटाये ही एक तीखी मुसकान दी जिसे देख धीरज झेंप गया और टिकट व पैसे ले चुपचाप अपनी सीट पर आकर बैठ गया। कंडक्टर के सरेआम मज़ाक से धीरज थोड़ा असहज महसूस कर रहा था।
इस दो कौड़ी के कंडक्टर ने पूरी बस के सामने मेरी इज़्ज़त दो कौड़ी कर दी। ये लड़की भी मेरे बारे में जाने क्या सोच रही होगी। गुस्से में लग रही है। गुस्सा होती है तो हो, मेरी बला से। लड़की को बस घूर ही तो रहा था, काई ऐसी-वैसी हरकत तो नहीं की?
लड़की अभी भी खिड़की के बाहर ही देख रही थी। धीरज ने खुद को सँभाला, थोड़ी देर इधर-उधर देखने का नाटक किया और फिर अपना ध्यान खिड़की के शीशे में दिख रहे लड़की के प्रतिबिंब पर टिका दिया।
छठी-सातवीं तक पढ़ी होगी। बहुत समझो तो हाईस्कूल। सेकंड डिवीज़न, आर्ट साइड। लड़की सीधी है पर पटाई जाए तो पट सकती है। बेटा धीरज ट्राई तो कर एक बार। मगर कैसे। मेरे फर्स्ट इंप्रैशन की तो इस कंडक्टर के बच्चे ने पहले ही वाट लगा दी। कोई नहीं। हिम्मते मर्दा मददे खुदा। अबे तू एम.बी.ए. है। बातों-बातों में बता दे फिर तो पटेगी ही। पर बात कैसे शुरू करू।
हाँ...फोन माँगता हूँ इससे। कह देता हूँ मेरे मोबाइल की बैट्री डिस्चार्ज हो गई है, एक अर्जेंट फोन करना है। लेकिन मना कर दिया तो? तब की तब देखी जाएगी। एक बार माँग तो सही।
''इक्सक्यूज़ मी मिस, कैन आई यूज़ योर फोन प्लीज़?''
'धीरे बोल धीरज धीरे।'
कहानी जारी है.......
उसने यह यह अंग्रेज़ी वाक्य संभल संभलक कर दुबारा दोहराया।
पर अंग्रेज़ी? अंग्रेज़ी समझ में आएगी इसे?
ना हिंदी में बोलना पड़ेगा।
''क्षमा करें मिस...मिस की हिंदी क्या होती है – बहिन जी। पागल हो गया है क्या। मिस ही बोल।''
''क्षमा करें मिस, क्या मैं आपका फोन का प्रयोग कर सकता हूँ?''
''बक साला। ऐसा लग रहा है जैसे दूरदर्शन पर सात बजे के हिंदी समाचार आ रहे हैं। अबे इतनी शुद्ध हिंदी क्यों बोल रहा है।''
''सीधा बोल – अपना फोन देना एक मिनट, एक ज़रूरी फोन करना है। हाँ ये हुई ना मर्दों वाली बात।''
अभी-अभी बहुमत जीती सरकार की तरह फ़ैसले की खुशी धीरज के चेहरे पर आ गई और इस खुशी के साथ जैसे ही अपनी बात कहने के लिये वो पल्टा, उल्टा लड़की ही उससे बोल पड़ी –
''अपना फोन देना एक मिनट, एक ज़रूरी फोन करना है।''
''ज...जी।'' - अपने शब्द लड़की के मुँह से सुनकर धीरज चौंक गया।
''फोन, मोबाइल फोन। मोबाइल रखते हो ना।''
''जी। है मेरे पास।''
''तो दो ना। मेरे फोन की बैट्री खत्म हो गई है। एक ज़रूरी फोन करना है। जितने का भी कॉल हो उसका पैसा ले लेना।''
''नहीं, पैसों की तो कोई बात नहीं है।'' – लड़की को फोन देता हुआ धीरज बोला।
इसने सुन लिया था क्या? – नंबर डायल करती हुई लड़की को देखकर धीरज सोचने लगा।
''हैलो। हैलो विकास।''
भाई होगा – धीरज ने सोचा। सुनने में तो भाई का ही नाम लग रहा है।
''तुमने मेरे भाई को फोन किया था क्या।''
''भाई नहीं है?... बायफ्रैंड है क्या? मुझसे मेरा फोन लेकर अपने बायफ्रैंड को फोन कर रही है। ये क्या किया तूने धीरज। अपने पैरों पर अपना ही फोन मार दिया। ओ लड़की, मेरा फोन वापस कर।''
''सुनो, ये किसी और का फोन है। तुम मुझे इस नंबर पर वापस फोन करो। ठीक है।'' - कहकर लड़की ने फोन काट दिया।
''तुम्हारे पैसे ना खर्च हों इसलिए इनकमिंग करा रही हूँ। थोड़ा वेट करो।'' धीरज को मोबाइल वापस लेने के लिये हाथ बढ़ाते देख लड़की बोली। हिचकिचाते हुए धीरज ने हाथ वापस खींच लिया।
इनतमिंद तला लही हूँ (इनकमिंग करा रही हूँ) धीरज ने उससे चिढ़ते हुए मन ही मन दोहराया। जैसे मेरा फोन यूज़ करके मुझपे कोई एहसान कर रही हो। ये फोन तो वैसे ही रोमिंग में है। अब तो दुगना खर्चा पड़ेगा और उसमें ये बैठ कर अपने बायफ्रैंड से रोमांस करेगी। धीरज बेटा फोन वापस ले ले, नहीं तो ये तेरा भट्टा बैठा देगी।
पर अंग्रेज़ी? अंग्रेज़ी समझ में आएगी इसे?
ना हिंदी में बोलना पड़ेगा।
''क्षमा करें मिस...मिस की हिंदी क्या होती है – बहिन जी। पागल हो गया है क्या। मिस ही बोल।''
''क्षमा करें मिस, क्या मैं आपका फोन का प्रयोग कर सकता हूँ?''
''बक साला। ऐसा लग रहा है जैसे दूरदर्शन पर सात बजे के हिंदी समाचार आ रहे हैं। अबे इतनी शुद्ध हिंदी क्यों बोल रहा है।''
''सीधा बोल – अपना फोन देना एक मिनट, एक ज़रूरी फोन करना है। हाँ ये हुई ना मर्दों वाली बात।''
अभी-अभी बहुमत जीती सरकार की तरह फ़ैसले की खुशी धीरज के चेहरे पर आ गई और इस खुशी के साथ जैसे ही अपनी बात कहने के लिये वो पल्टा, उल्टा लड़की ही उससे बोल पड़ी –
''अपना फोन देना एक मिनट, एक ज़रूरी फोन करना है।''
''ज...जी।'' - अपने शब्द लड़की के मुँह से सुनकर धीरज चौंक गया।
''फोन, मोबाइल फोन। मोबाइल रखते हो ना।''
''जी। है मेरे पास।''
''तो दो ना। मेरे फोन की बैट्री खत्म हो गई है। एक ज़रूरी फोन करना है। जितने का भी कॉल हो उसका पैसा ले लेना।''
''नहीं, पैसों की तो कोई बात नहीं है।'' – लड़की को फोन देता हुआ धीरज बोला।
इसने सुन लिया था क्या? – नंबर डायल करती हुई लड़की को देखकर धीरज सोचने लगा।
''हैलो। हैलो विकास।''
भाई होगा – धीरज ने सोचा। सुनने में तो भाई का ही नाम लग रहा है।
''तुमने मेरे भाई को फोन किया था क्या।''
''भाई नहीं है?... बायफ्रैंड है क्या? मुझसे मेरा फोन लेकर अपने बायफ्रैंड को फोन कर रही है। ये क्या किया तूने धीरज। अपने पैरों पर अपना ही फोन मार दिया। ओ लड़की, मेरा फोन वापस कर।''
''सुनो, ये किसी और का फोन है। तुम मुझे इस नंबर पर वापस फोन करो। ठीक है।'' - कहकर लड़की ने फोन काट दिया।
''तुम्हारे पैसे ना खर्च हों इसलिए इनकमिंग करा रही हूँ। थोड़ा वेट करो।'' धीरज को मोबाइल वापस लेने के लिये हाथ बढ़ाते देख लड़की बोली। हिचकिचाते हुए धीरज ने हाथ वापस खींच लिया।
इनतमिंद तला लही हूँ (इनकमिंग करा रही हूँ) धीरज ने उससे चिढ़ते हुए मन ही मन दोहराया। जैसे मेरा फोन यूज़ करके मुझपे कोई एहसान कर रही हो। ये फोन तो वैसे ही रोमिंग में है। अब तो दुगना खर्चा पड़ेगा और उसमें ये बैठ कर अपने बायफ्रैंड से रोमांस करेगी। धीरज बेटा फोन वापस ले ले, नहीं तो ये तेरा भट्टा बैठा देगी।
''तुझे दूल्हा किसे बनाया, भूतनी...'' अभी धीरज सोच ही रहा था कि फोन की सिंगटोन बज उठी।
लड़की गाना सुनकर हल्का-सा मुस्कुराई और फिर मेरा है कहकर फोन उठा लिया।
''हैलो विकास। या आरती हीयर। तुमने भैया को क्यों फोन किया।''
''भैय्या को फोन क्यों किया – भैय्या को फोन क्यों किया। क्या गँवारों की तरह एक ही बात घिसे जा रही है। जल्दी से फोन काटो मिस, मेरा बिल बढ़ रहा है।'' धीरज एक-एक सैकिंड काउन्ट करते हुए सोचने लगा।
''नहीं, मेरी बात सुनो। मुझसे फिर मिलने की कोशिश मतर करना।''
''हीयर यू आर'' – लड़की ने फोन काटकर गुस्से में धीरज की तरफ़ बढ़ा दिया।
''ज......जी'' – गँवार सी दिखने वाली लड़की के मुँह से अंग्रेज़ी सुनकर धीरज की आँखें आश्चर्य से फट
गईं।
''फोन। याद है या नहीं यह फोन तुम्हारा है तुमने मुझे दिया था।''
''याद है याद है।''
''रियली? फिर इसे वापस ले लो।'' लड़की झुंझलाहट भरी आवाज़ में बोली।
गुस्से में कहीं फोन ही ना पटक दे सोचकर धीरज ने फोन वापस लिया और चुपचाप सामने देखने लगा। धीरज अब तक पूरी तरह चकरा चुका था।
देखने में तो गँवार लगती है पर बड़ी फर्राटेदार इंग्लिश बोल रही है। इंडिया शाइनिंग। नोयडा के किसी कॉल सेंटर में काम करती होगी।
कॉल-सेंटर का विचार आते ही, हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान अनजाने में ही उसके होंठो पर आ गई।
''पैसे कितने हुए तुम्हारे?'' धीरज की मुस्कारते हुए देख लड़की बोली।
''जाने दीजिए।''
''जाने दूँ। जाने क्यों दूँ? एहसान करना चाहते हो क्या मुझपर? धर्मखाता खोल...''
''दस रुपए।'' धीरज ने लड़की को बीच में ही काटते हुए कहा।
बीच में ही बात कटने से लड़की इस बार थोड़ी-सी असहज हो गई।
''दस रुपए। दस कैसे हो गए। एक ही मिनट तो बात की थी मैंने आउटगोइंग पर।''
''जी, दरअसल ये फोन रोमिंग पर है।''
''तो पहले क्यों नहीं बताया? मैं किसी और से ले लेती।''
''माफ़ कीजिए। अगली बार बता दूँगा।'' धीरज ने अपनी गलती मान ली।
''अगली बार क्या? मैं क्या फोन ही करती रहूँगी? ये लो दस रुपए।''
धीरज ने बिना कुछ बोले ही दस रुपए रखने में ही भलाई समझी।
''करते क्या हो?'' लड़की ने बात शुरू की।
लड़की गाना सुनकर हल्का-सा मुस्कुराई और फिर मेरा है कहकर फोन उठा लिया।
''हैलो विकास। या आरती हीयर। तुमने भैया को क्यों फोन किया।''
''भैय्या को फोन क्यों किया – भैय्या को फोन क्यों किया। क्या गँवारों की तरह एक ही बात घिसे जा रही है। जल्दी से फोन काटो मिस, मेरा बिल बढ़ रहा है।'' धीरज एक-एक सैकिंड काउन्ट करते हुए सोचने लगा।
''नहीं, मेरी बात सुनो। मुझसे फिर मिलने की कोशिश मतर करना।''
''हीयर यू आर'' – लड़की ने फोन काटकर गुस्से में धीरज की तरफ़ बढ़ा दिया।
''ज......जी'' – गँवार सी दिखने वाली लड़की के मुँह से अंग्रेज़ी सुनकर धीरज की आँखें आश्चर्य से फट
गईं।
''फोन। याद है या नहीं यह फोन तुम्हारा है तुमने मुझे दिया था।''
''याद है याद है।''
''रियली? फिर इसे वापस ले लो।'' लड़की झुंझलाहट भरी आवाज़ में बोली।
गुस्से में कहीं फोन ही ना पटक दे सोचकर धीरज ने फोन वापस लिया और चुपचाप सामने देखने लगा। धीरज अब तक पूरी तरह चकरा चुका था।
देखने में तो गँवार लगती है पर बड़ी फर्राटेदार इंग्लिश बोल रही है। इंडिया शाइनिंग। नोयडा के किसी कॉल सेंटर में काम करती होगी।
कॉल-सेंटर का विचार आते ही, हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान अनजाने में ही उसके होंठो पर आ गई।
''पैसे कितने हुए तुम्हारे?'' धीरज की मुस्कारते हुए देख लड़की बोली।
''जाने दीजिए।''
''जाने दूँ। जाने क्यों दूँ? एहसान करना चाहते हो क्या मुझपर? धर्मखाता खोल...''
''दस रुपए।'' धीरज ने लड़की को बीच में ही काटते हुए कहा।
बीच में ही बात कटने से लड़की इस बार थोड़ी-सी असहज हो गई।
''दस रुपए। दस कैसे हो गए। एक ही मिनट तो बात की थी मैंने आउटगोइंग पर।''
''जी, दरअसल ये फोन रोमिंग पर है।''
''तो पहले क्यों नहीं बताया? मैं किसी और से ले लेती।''
''माफ़ कीजिए। अगली बार बता दूँगा।'' धीरज ने अपनी गलती मान ली।
''अगली बार क्या? मैं क्या फोन ही करती रहूँगी? ये लो दस रुपए।''
धीरज ने बिना कुछ बोले ही दस रुपए रखने में ही भलाई समझी।
''करते क्या हो?'' लड़की ने बात शुरू की।
बसों मे पी.सी.ओ. चला रखा है मैंने। लड़कियों को फोन लेंड करता हूँ और फिर उनकी झाड़ खाता हूँ। - धीरज सोचने लगा।
''बेरोजगार हो क्या?'' लड़की ने धीरज की चुप्पी का मतलब निकालते हुए पूछा।
धीरज ने एक पल को अपनी एम.बी.ए. की ग्लैमरस डिग्री के बारे में सोचा और फिर हाँ कर दी।
''पढ़े-लिखे हो?''
''जी, थोड़ा-बहुत।''
''थोड़ा या बहुत?''
''थोड़ा।'' बहुत सारे एम.बी.ए. में थोड़ी ही तो पढ़ाई की थी धीरज ने।
''हुम्म..., देखने में तो शरीफ़ खानदान के लगते हो।''
''जी शुक्रिया।''
काश! होता भी शरीफ़ खानदान से ही। धीरज ने मन ही मन सोचा।
''कॉल सेंटर में जॉब करना चाहोगे?''
मरीन इंजीनियरिंग फ्रॉम जाधवपुर यूनिवर्सिटी, एम.बी.ए. फ्रॉम एन. एम. आई.एम.एस.। अब बस कॉल सेंटर में ही जॉब करना बाकी रह गया है।
''पैसे कितने मिल जाएँगे?'' धीरज एक पल सोचकर बोला।
''अरे! पहले नौकरी तो मिले, पैसे तो बाद में मिलेंगे। अपना पर्सनल रिकमेंडेशन पर तुम्हें लगवा सकती हूँ, पर काम ठीक से करना होगा।''
बस ज़रा देर के लिए एक बस स्टैण्ड पर रुकी तो दीवार पर लगे 'प्यासा आशिक' के उत्तेजक पोस्टर को देखकर धीरज कुछ असहज हो गया। नज़र पोस्टर से हटाते हुए उसने लड़की के स्वर में हामी भरी तो लड़की को स्थिति समझते देर न लगी।
''पोस्टर देखकर शर्मा रहे हो?'' लड़की मुस्कुसाते हुए बोली।
''जी ... जी..।''
''हा हा..., संस्कार तो अच्छे हैं तुम्हारे।''
''शुक्रिया।'' धीरज को अपने संस्कारों के बारे में जानकर खुशी हुई।
''शुक्रिया तो अपने माँ-बाप का करो जिन्होनें तुम्हारे अंदर इतने अच्छे संस्कार डाले।''
''जी आज ही जाकर करता हूँ।''
बस अब चल दी थी।
''अंग्रेज़ी बोल लेते हो ना?'' लड़की ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए पूछा।
''जी थोड़ी बहुत।''
कहानी जारी है.......
''बेरोजगार हो क्या?'' लड़की ने धीरज की चुप्पी का मतलब निकालते हुए पूछा।
धीरज ने एक पल को अपनी एम.बी.ए. की ग्लैमरस डिग्री के बारे में सोचा और फिर हाँ कर दी।
''पढ़े-लिखे हो?''
''जी, थोड़ा-बहुत।''
''थोड़ा या बहुत?''
''थोड़ा।'' बहुत सारे एम.बी.ए. में थोड़ी ही तो पढ़ाई की थी धीरज ने।
''हुम्म..., देखने में तो शरीफ़ खानदान के लगते हो।''
''जी शुक्रिया।''
काश! होता भी शरीफ़ खानदान से ही। धीरज ने मन ही मन सोचा।
''कॉल सेंटर में जॉब करना चाहोगे?''
मरीन इंजीनियरिंग फ्रॉम जाधवपुर यूनिवर्सिटी, एम.बी.ए. फ्रॉम एन. एम. आई.एम.एस.। अब बस कॉल सेंटर में ही जॉब करना बाकी रह गया है।
''पैसे कितने मिल जाएँगे?'' धीरज एक पल सोचकर बोला।
''अरे! पहले नौकरी तो मिले, पैसे तो बाद में मिलेंगे। अपना पर्सनल रिकमेंडेशन पर तुम्हें लगवा सकती हूँ, पर काम ठीक से करना होगा।''
बस ज़रा देर के लिए एक बस स्टैण्ड पर रुकी तो दीवार पर लगे 'प्यासा आशिक' के उत्तेजक पोस्टर को देखकर धीरज कुछ असहज हो गया। नज़र पोस्टर से हटाते हुए उसने लड़की के स्वर में हामी भरी तो लड़की को स्थिति समझते देर न लगी।
''पोस्टर देखकर शर्मा रहे हो?'' लड़की मुस्कुसाते हुए बोली।
''जी ... जी..।''
''हा हा..., संस्कार तो अच्छे हैं तुम्हारे।''
''शुक्रिया।'' धीरज को अपने संस्कारों के बारे में जानकर खुशी हुई।
''शुक्रिया तो अपने माँ-बाप का करो जिन्होनें तुम्हारे अंदर इतने अच्छे संस्कार डाले।''
''जी आज ही जाकर करता हूँ।''
बस अब चल दी थी।
''अंग्रेज़ी बोल लेते हो ना?'' लड़की ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए पूछा।
''जी थोड़ी बहुत।''
कहानी जारी है.......
''थोड़ी या...''
''थोड़ी...थोड़ी, कामचलाऊ।'' धीरज ने आगे के प्रश्न का अंदाज़ा लगाते हुए उत्तर दिया।
''हूँ..ऊँ...ऊँ अपना परिचय तैयार करो एक, इंग्लिश में, बढ़िया-सा, कॉल सेंटर में क्यों काम करना चाहते हो जैसे प्रश्न पूछेंगे वो लोग। फंडे दे देना कुछ। मैं बता दूँगी। बाकी देखने में तो ठीक ही हो। कपड़े थोड़े ढंग के पहना करो।''
कपड़ों की बात सुनकर धीरज थोड़ा खीझ गया और फ्लोटर के खुले भाग से फटी जुराब से बाहर झाँकते अपने अँगूठे को अंदर खींच लिया।
''लेकिन तुम्हें अपने उच्चारण को बेहतर करना होगा। बिलकुल भारतीय उच्चारण है तुम्हारा। ये नहीं चलेगा।''
''जी।''
''ये जी जी क्या लगा रखा है। क्या मैं तुम्हारी जीजी हूँ?''
''जी...जी नहीं।''
धीरज की आवाज़ की बेचैनी सुनकर लड़की के होंठो पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
''फोन के लिए शुक्रिया।''
''कोई बात नहीं।'' कह धीरज ने मोबाइल फोन के साथ छेड़खानी शुरू कर दी। आज पहली बार वह किसी लड़की के साथ बस में आया था।
खिड़की से बाहर झाँकती हुई लड़की को देख धीरज सोचने लगा – जब वी मेट की करीना कपूर टाइप लग रही है। उतनी सुंदर तो नहीं है पर सुंदरता का क्या है, सुंदरता तो देखने वाले की आँखों में होती है। बोलती बहुत है। मुझसे भी ज़्यादा। आज पहली बार किसी बातचीत में सामने वाले ने मुझसे ज़्यादा बात की होगी। कुछ ज़्यादा ही तेज़ है। धीरज बेटा यहाँ तेरी दाल गलने से रही। तुझसे तो सीधी-साधी लड़कियाँ भी नहीं पटतीं फिर ये तो अच्छी भली तेज़-तर्राट है। लेकिन एक कोशिस करने में क्या बुराई है? नाम पूछ ल,। बता दे तो नंबर माँग लेना, नहीं तो तू अपनी गली, मैं अपनी गली। ठीक है नाम पूछता हूँ।
नाम पूछने के लिए जैसे ही धीरज ने 'न' बोला कि बस रुक गई।
''बाबूगढ़ आ गया है। बस इससे आगे नहीं जाएगी। सारी सवारियाँ यहीं उतर लें।'' कंडक्टर चिल्ला रहा था।
''बक साला! इस बाबूगढ़ को भी अभी आना था। हर बार तो दो घंटे लगते हैं, आज डेढ़ घंटे में ही पहुँचा दिया।'' धीरज ने बस ड्राइवर को कोसा।
''कुछ कह रहे थे क्या तुम?'' लड़की ने धीरज से पूछा।
''न..नहीं...नहीं तो।''
''थोड़ी...थोड़ी, कामचलाऊ।'' धीरज ने आगे के प्रश्न का अंदाज़ा लगाते हुए उत्तर दिया।
''हूँ..ऊँ...ऊँ अपना परिचय तैयार करो एक, इंग्लिश में, बढ़िया-सा, कॉल सेंटर में क्यों काम करना चाहते हो जैसे प्रश्न पूछेंगे वो लोग। फंडे दे देना कुछ। मैं बता दूँगी। बाकी देखने में तो ठीक ही हो। कपड़े थोड़े ढंग के पहना करो।''
कपड़ों की बात सुनकर धीरज थोड़ा खीझ गया और फ्लोटर के खुले भाग से फटी जुराब से बाहर झाँकते अपने अँगूठे को अंदर खींच लिया।
''लेकिन तुम्हें अपने उच्चारण को बेहतर करना होगा। बिलकुल भारतीय उच्चारण है तुम्हारा। ये नहीं चलेगा।''
''जी।''
''ये जी जी क्या लगा रखा है। क्या मैं तुम्हारी जीजी हूँ?''
''जी...जी नहीं।''
धीरज की आवाज़ की बेचैनी सुनकर लड़की के होंठो पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
''फोन के लिए शुक्रिया।''
''कोई बात नहीं।'' कह धीरज ने मोबाइल फोन के साथ छेड़खानी शुरू कर दी। आज पहली बार वह किसी लड़की के साथ बस में आया था।
खिड़की से बाहर झाँकती हुई लड़की को देख धीरज सोचने लगा – जब वी मेट की करीना कपूर टाइप लग रही है। उतनी सुंदर तो नहीं है पर सुंदरता का क्या है, सुंदरता तो देखने वाले की आँखों में होती है। बोलती बहुत है। मुझसे भी ज़्यादा। आज पहली बार किसी बातचीत में सामने वाले ने मुझसे ज़्यादा बात की होगी। कुछ ज़्यादा ही तेज़ है। धीरज बेटा यहाँ तेरी दाल गलने से रही। तुझसे तो सीधी-साधी लड़कियाँ भी नहीं पटतीं फिर ये तो अच्छी भली तेज़-तर्राट है। लेकिन एक कोशिस करने में क्या बुराई है? नाम पूछ ल,। बता दे तो नंबर माँग लेना, नहीं तो तू अपनी गली, मैं अपनी गली। ठीक है नाम पूछता हूँ।
नाम पूछने के लिए जैसे ही धीरज ने 'न' बोला कि बस रुक गई।
''बाबूगढ़ आ गया है। बस इससे आगे नहीं जाएगी। सारी सवारियाँ यहीं उतर लें।'' कंडक्टर चिल्ला रहा था।
''बक साला! इस बाबूगढ़ को भी अभी आना था। हर बार तो दो घंटे लगते हैं, आज डेढ़ घंटे में ही पहुँचा दिया।'' धीरज ने बस ड्राइवर को कोसा।
''कुछ कह रहे थे क्या तुम?'' लड़की ने धीरज से पूछा।
''न..नहीं...नहीं तो।''
''तो उतरो, आ तो गया बाबूगढ़। अब क्या यहीं बैठे रहने का इरादा है?''
हाँ कहकर धीरज उतरने लगा। बस से उतरकर धीरज ने सामने लगे रब ने बना दी जोड़ी के पोस्टर को देखा और हमेशा की तरह अपनी किस्मत को कोसने लगा कि तभी पीछे से आती एक पतली आवाज़ ने उसका ध्यान तोड़ा। ये वही लड़की थी जो अब रिक्शा मे बैठ चुकी थी और उसे ही बुला रही थी।
''धीरज, यही नाम है ना तुम्हारा? ''
''हाँ..!'' धीरज ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
''तुम्हारे मोबाइल में लिखा था। मेरा नाम आरती है। ये मेरा कार्ड है। इस पर दिये पते पर अपना सी.वी. लेकर सोमवार को आ जाना। तुम्हें नौकरी मिल जाएगी।''
''जी बहुत अच्छा।''
''आरती। मुझे आरती कह सकते हो। बाय।''
''बाय।''
आरती के आँखों से ओझल होने तक, धीरज वहीँ खड़ा रिक्शा को जाते देखता रहा। एक बार मन में आया कि भाग कर आरती को रोक ले पर फिर पता नहीं क्या सोचकर उसने मन को रोक लिया। आरती का दिया कार्ड अभी भी उसके हाथ में था। धीरज ने पीठ पर अपना बैग लादा और आरती का दिया कार्ड पढ़ता हुआ अपनी राह चल पड़ा।
आरती शर्मा,
बिज़नेस डेवलपमेंट मैनेजर
आस्क योर क्वेरी इंडिया लिमिटेड
सेक्टर 50- नोयडा
बिज़निस डवलैपमेंट मैनेजर! क्या बात है! पर इस कार्ड का क्या करूँ नौकरी तो मुझे चाहिए नहीं और नंबर इस पर लिखा नहीं है। कॉल क्या धंतु करूँगा। झुँझलाहट में आकर धीरज कार्ड को फेंकने ही वाला था कि उसने देखा- कार्ड के पीछे लाल स्याही में एक फोन नम्बर लिखा था - धीरज ने एक बार फिर रब ने बना दी जोड़ी के पोस्टर पर नज़र डाली और कार्ड को चूमकर अपनी जेब में रख लिया।
!!!! समाप्त !!!!
हाँ कहकर धीरज उतरने लगा। बस से उतरकर धीरज ने सामने लगे रब ने बना दी जोड़ी के पोस्टर को देखा और हमेशा की तरह अपनी किस्मत को कोसने लगा कि तभी पीछे से आती एक पतली आवाज़ ने उसका ध्यान तोड़ा। ये वही लड़की थी जो अब रिक्शा मे बैठ चुकी थी और उसे ही बुला रही थी।
''धीरज, यही नाम है ना तुम्हारा? ''
''हाँ..!'' धीरज ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
''तुम्हारे मोबाइल में लिखा था। मेरा नाम आरती है। ये मेरा कार्ड है। इस पर दिये पते पर अपना सी.वी. लेकर सोमवार को आ जाना। तुम्हें नौकरी मिल जाएगी।''
''जी बहुत अच्छा।''
''आरती। मुझे आरती कह सकते हो। बाय।''
''बाय।''
आरती के आँखों से ओझल होने तक, धीरज वहीँ खड़ा रिक्शा को जाते देखता रहा। एक बार मन में आया कि भाग कर आरती को रोक ले पर फिर पता नहीं क्या सोचकर उसने मन को रोक लिया। आरती का दिया कार्ड अभी भी उसके हाथ में था। धीरज ने पीठ पर अपना बैग लादा और आरती का दिया कार्ड पढ़ता हुआ अपनी राह चल पड़ा।
आरती शर्मा,
बिज़नेस डेवलपमेंट मैनेजर
आस्क योर क्वेरी इंडिया लिमिटेड
सेक्टर 50- नोयडा
बिज़निस डवलैपमेंट मैनेजर! क्या बात है! पर इस कार्ड का क्या करूँ नौकरी तो मुझे चाहिए नहीं और नंबर इस पर लिखा नहीं है। कॉल क्या धंतु करूँगा। झुँझलाहट में आकर धीरज कार्ड को फेंकने ही वाला था कि उसने देखा- कार्ड के पीछे लाल स्याही में एक फोन नम्बर लिखा था - धीरज ने एक बार फिर रब ने बना दी जोड़ी के पोस्टर पर नज़र डाली और कार्ड को चूमकर अपनी जेब में रख लिया।
!!!! समाप्त !!!!


0 Comments